तेनाली रमन हिंदी कहानिया | Tenali Raman story hindi | tenali raman hindi stories |


 Tenali Raman story hindi or tenaliraman hindi stories- तेनाली रमन हिंदी कहानिया हम सब बचपन से सुनते आ रहे है। Tenali raman story- तेनाली रमन को तेनाली रामा के नाम से भी जाना जाता है। तेनाली रमन अपने चतुर बुद्धि के कारन प्रसित्द्ध थे।Tenali raman - तेनाली रमन हर काम को बड़ी चतुराई के साथ पूरा करते थे।  दोस्तों हिंदी Story Line आपके लिए लेकर आये है ऐसे ही मजेदार हिंदी कहानिया। यह कहानी को भी पढ़े  रामलिंगम से तेनाली रमन तक का सफर  


 १ तेनालीराम और सोने के आम

tenali raman hindi stories
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 समय के साथ-साथ राजा कृष्णदेव राय के माता बहुत  बूढ़ी हो गई थी । एक बार वह बहुत बीमार पड़ गए उन्हें लगा कि अब वह शीघ्र ही मर जाएगी । राजा कृष्णदेव राय के माता को आप बहुत पसंद थे । इसलिए जीवन के अंतिम दिनों में वे आम दान करना चाहती थी। सो उन्होंने राजा कृष्णदेव राय से कहा कि उन्हें आमों का दान करने की इच्छा है। वे समझती थी इस प्रकार  दान करने से उन्हें स्वर्ग की प्राप्ति होगी। 

कुछ दिनों बाद अपने अंतिम इच्छा की पूर्ति करना चाहती थी। परंतु इच्छा पूर्ति होने से पहले ही वह मृत्यु को प्राप्त हो गए । उनकी मृत्यु के बाद राजा ने सभी विद्वानों को बुलाया और अपनी मां की  अंतिम इच्छा के बारे में बताया । 

कुछ देर तक चुप रहकर ब्राह्मण बोले यह तो बहुत ही बुरा हुआ महाराज अंतिम इच्छा के पूरे ना होने की दशा में उन्हें मुक्ति ही नहीं मिलेगी वह प्रेत योनि में ही भटकते रह जाएगी । महाराज आपको उनकी आत्मा की शांति का उपाय करना चाहिए । महाराज ने उनसे अपने माता की अंतिम इच्छा की पूर्ति का उपाय पूछा। ब्राह्मण बोले उनकी आत्मा की शांति के लिए आप को उनकी पुण्यतिथि पर सो सुवर्ण आमों का दान करना पड़ेगा।

 राजा ने अपनी माता की पुण्यतिथि पर कुछ ब्राह्मणों के लिए भोजन के लिए बुलाया और प्रत्येक को सोने से बने आम दान में दे दिए । जब तेनालीराम  को यह बात पता चली तो वह तुरंत समझ गया  यह ब्राह्मणों की नई चाल है । 

ब्राह्मण लोग राजा की सरलता तथा भोलेपन का फायदा उठा रहे हैं । तेनालीराम ने सारे ब्राह्मणों को पाठ पाठ पढ़ने की योजना बनाई। 

अगले दिन तेनालीराम ने ब्राह्मणों को एक निमंत्रण पत्र भेजा । उसमें लिखा था कि तेनालीराम भी अपनी माता की पुण्यतिथि पर दान करना चाहता है। क्योंकि वह भी अपनी अंतिम इच्छा लेकर मरी थी। जब से उसे पता चला है कि उसकी मां की अंतिम इच्छा पूरी ना होने के कारण प्रेत योनि में भटकती रहेगी तो वह बहुत ही दुखी हैं और चाहते हैं कि जल्दी से जल्दी उनकी मां की अंतिम इच्छा पूरी की जाए। ताकि उनकी आत्मा को शांति मिल सके।

 ब्राह्मणों ने सोचा कि तेनालीराम के घर से भी बहुत अधिक मिलेगा क्योंकि वह शाही विदूषक है। सभी ब्राह्मण निश्चित दिन तेनालीराम के घर पहुंचे ब्राह्मणों को स्वादिष्ट भोजन परोसा गया भोजन करने के पश्चात सभी दान मिलने की प्रतीक्षा करने लगे तभी उन्होंने देखा की तेनालीराम लोहे की सलाखों को आग में गर्म कर रहा है। ब्राह्मणों के पूछने पर तेनालीराम बोला मेरी मां फोड़े के दर्द से परेशान थी। 

मेरी मां की मृत्यु के समय में बहुत तेज दर्द हो रहा था। इससे पहले की मैं गर्म सलाखों से उनकी सिखाई करता वह मर चुकी थी। अब उनके शांति के लिए मुझे आपके साथ वैसा ही करना पड़ेगा जैसे ही उनकी अंतिम इच्छा थी । यह सुनकर बौखला गए देवा से तुरंत चले जाना चाहते थे । 

वह गुस्से में तेनालीराम से बोले हमें गर्म सलाखों से डालने पर तुम्हारे मां की आत्मा को कैसे शांति मिलेगी?  नहीं महाशय मैं झूठ नहीं बोल रहा तेनालीराम ने कहा यदि सोने के आम दान में मिलने पर महाराज के माता  की आत्मा को शांति मिल सकती है तो अपनी मां की अंतिम इच्छा क्यों नहीं पूरी कर सकता मैं?

 यह सुनते ही सभी ब्राह्मण समझ गए कि तेनालीराम क्या कहना चाहता है। वह बोले तेनालीराम हमें क्षमा करो हम वह सोने की हम नहीं चाहते हम तुम्हें दे देते हैं।  बस अब तुम हमें जाने दो ।

 तेनालीराम ले लिया और उन्हें जाने दिया । परंतु एक लालची ब्राह्मण ने सारी बात राजा को बता दे  दे दी । लालची ब्राह्मण की बात सुनकर राजा को बहुत गुस्सा आ गया और राजा बड़ा क्रोधित हुआ और उन्होंने तेनालीराम को बुलाया। 

राजा कृष्णदेवराय तेनालीराम से बोले तेनाली रामा यदि तुम्हें सोने के आम चाहिए थे तो मुझसे मांग लेते तुम इतने लालची कैसे हो गए कि तुमने ब्राह्मणों से सोने के आम ले लिए । तेनालीराम ने कहा महाराज  मैं लालची नहीं हूं । मैं तो उनकी लालच की प्रकृति को तोल रहा था।  

यदि वह आपकी मां की इच्छा की पुण्यतिथि पर सोने के आम ग्रहण कर सकते हैं तो मेरे मां की पुण्यतिथि पर लोहे की गर्म सलाखें क्यों नहीं झेल सकते । 

राजा कृष्णदेवराय तेनालीराम की बात का अर्थ समझ गए उन्होंने ब्राह्मणों को बुलाया और उन्हें भविष्य में लालच रखने के लिए कहा । सर्व ब्राह्मण समझ गए और  क्षमा मांग कर चले गए ।



२ स्वर्ग की खोज



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अपने बचपन में सुनी कथा के अनुसार यह विश्वास करते थे कि संसार ब्रह्मांड की सबसे उत्तम और मनमोहक जगह स्वर्ग है। एक दिन अचानक महाराज को स्वर्ग देखने की इच्छा उत्पन्न होती है । 

राजा कृष्णदेव रायएक बार दरबार में उपस्थित मंत्रियों से पूछते हैं। बताइए स्वर्ग कहां है? सारे मंत्री व सिर खुजाते बैठे रहते हैं।  परंतु चतुर तेनालीराम महाराज कृष्ण देव राय को स्वर्ग का पता बताने का वचन देता है।और इस काम के लिए 10,000 सोने के सिक्के और 2 माह का समय मांगते हैं। 

महाराज तेनालीराम को सोने के सिक्केऔर 2 माह का समय दे देते हैं। और शर्त रखते हैं कीअगर तेनालीराम ऐसा ना कर सकेतो उन्हें कड़ी से कड़ी सजा दी जाएगी।

सरे दरबारी तेनालीराम की कुशलतासे काफी जलते थे।और इस बात से मन ही मन में बहुत खुश होते थे। 
सारे दरबारी और मंत्रियों को लगता था कि तेनालीरामस्वर्ग नहीं खोज पाएंगेऔर राजा कृष्णदेव राय से  शिक्षा पाएंगे । और बड़ी सजा भुक्तेंगा। दो माह की अवधि भी जाते हैं । महाराज कृष्णदेवराय तेनालीराम को दरबार में बुलाते हैं। तेनालीराम कहते हैं कि उन्होंने स्वर को ढूंढ लिया है। और वह कल सुबह स्वर्ग देखने के लिए प्रस्थान  करेंगे।  

अगले दिन तेनालीराम महाराज कृष्ण देव राय और उनके खास मंत्री गणों को उनके सुंदर स्थान पर ले जाते हैं जहां खूब हरियाली  खिलाते हुए पक्षीचलाते हुए पक्षी और वातावरण को शुद्ध करने वाले पेड़ पौधे होते हैं । जगह का सौंदर्य देख महाराज कृष्ण देव राय अति प्रसन्न होते हैं। पर उनके  मंत्री गण  राजा कृष्णदेव राय को स्वर्ग देखने की याद दिलाते रहते  थे । 

 महाराज कृष्णदेवराय तेनालीराम से उसका वादा निभाने के लिए  कहते हैं ।  उसके जवाब में तेनालीराम कहते हैं जब हमारी पृथ्वी फल फूल पेड़ पौधे अन्य प्रकार के पशु पक्षी और अद्भुत वातावरण और अलौकिक सौंदर्य से भरी हुई है फिर स्वर्ग की कामना ही क्यों?  जबकि स्वर्ग जैसी कोई जगह है ही नहीं इसका प्रमाण ही नहीं है । 

महाराज कृष्ण देव राय  चित्तूर तेनालीराम की बात समझ आ जाती है और वह उनकी प्रशंसा करते हैं ।  लेकिन बाकी मंत्री   जलन के मारे महाराज को 10000 सोने के सिखों की याद दिलाते हैं तब महाराज कृष्णदेवराय तेनालीराम से पूछते हैं तुमने  सोने के सिक्के उपयोग  किया? 

तब तेनालीराम कहते हैं कि वह उन्होंने खर्च कर दिए धनाराम कहते हैं अपने जो 10,000 सोने के सिक्के मुझे दिए थे । उससे मैंने इस जगह से उत्तम पौधे और उच्च जाति के  बीज खरीदे हैं । जिनको हम अपने राज्य के विजय नगर के जमीन पर उग आएंगे ताकि हमारा राज्य इस सुंदर स्थान के समीप आकर्षित और उपजाऊ बन सके। महाराज इस बात से और भी प्रसन्न हो जाते हैं और तेनालीराम को ढेरों इनाम देते हैं। और एक बार फिर मां की मंत्री अपना सा छोटा सा मुंह लेकर रह जाते हैं ।


 

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