तेनाली रमन हिंदी कहानिया | Tenali Raman story hindi | tenali raman hindi stories | तेनालीराम और अपमान का बदला

 Tenali Raman story hindi or tenaliraman hindi stories- तेनाली रमन हिंदी कहानिया हम सब बचपन से सुनते आ रहे है। Tenali raman story- तेनाली रमन को तेनाली रामा के नाम से भी जाना जाता है। तेनाली रमन अपने चतुर बुद्धि के कारन प्रसित्द्ध थे।Tenali raman - तेनाली रमन हर काम को बड़ी चतुराई के साथ पूरा करते थे।  दोस्तों हिंदी Story Line आपके लिए लेकर आये है ऐसे ही मजेदार हिंदी कहानिया। यह कहानी को भी पढ़े  रामलिंगम से तेनाली रमन तक का सफर  


तेनालीराम और अपमान का बदला

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तेनालीराम ने सुना था कि राजा कृष्णदेव राय  बुद्धिमान लोगों का बड़ा सम्मान करते हैं। तेनालीराम ने सोचा क्यों ना उनकी यहां पर जाकर अपना भाग्य आजमा जाए । लेकिन बिना किसी सिफारिश के राजा के पास जाना टेढ़ी खेल होगी। तेनालीराम किसी के अवसर का इंतजार कर रहे थे । जब भी तेनालीराम की भेंट किसी महत्वपूर्ण व्यक्ति से हो सके और उसे एक अवसर मिल जाए।
 इसी बीच तेनालीराम का विवाह दूर की नाते  की एक लड़की के साथ हुआ पूर्ण मेरा 1 वर्षों के बाद उसके घर एक बेटा हुआ ।
 इन्हीं दिनों राजा कृष्णदेव राय का एक महत्वपूर्ण मंत्री राजगुरु मंगलगिरी नामक स्थान पर गया था । वहां पर जाकर रामलिंग ने उसकी बहुत सेवा की और अपनी समस्या कह सुनाई । राजगुरु बहुत चालाक था। उसने राम लिंग को खूब सेवा करवाई और उसे बहुत लंबे चौड़े वादे दे दिए । रामलिंग अतः तेनालीरामने राजगुरु पर विश्वास कर लिया और राजगुरु को प्रसन्न करने के लिए उसने दिन रात एक कर दिए । 

राजगुरु  ऊपर से तो चिकनी चुपड़ी बातें करता था। लेकिन मन ही मन में तेनालीराम से जलने लगा । उसने सोचा कि इतना बुद्धिमान और विद्वान व्यक्ति राजा के दरबार में आ गया तो उसके अपनी कीमत गिर जाएगी । से करवाने के लिए तुम्हें बुला लूंगा । 
तेनालीराम राजगुरु के बुलावे की प्रतीक्षा करने  लगा। लेकिन बहुत राहत अपने के बाद भी राजगुरु का कोई बुलावा नहीं आया। गांव के लोग तेनालीराम से हर वक्त यही पूछा करते थे क्यों  राम लिंग सामान बांधा कि नहीं?  कोई कहता कि मैंने सुना ही तो मैं विजयनगर जाने के लिए राजा कृष्णदेवराय ने तुम्हारे लिए एक विशेष दूत भेजा है । 

तेनालीराम बस एक ही बात करता कि समय आने पर सब कुछ बता दूंगा। लेकिन मन ही मन में उसका विश्वास राजगुरु से उठ गया था। तेनालीराम ने बहुत दिन तक इस समय प्रतीक्षा की कि राजगुरु  उसे विजयनगर बुलवा लेंगे लेकिन अंत में निराश होकर उसने फैसला किया कि वह स्वयं ही विजय नगर जाएगा ।
तेनालीराम ने अपना घर और घर का सारा सामान बेचकर यात्रा का खर्च जुटाया और मां पत्नी और अपने बेटे के साथ विजय नगर के लिए रवाना हो गया।  

यात्रा में जहां कोई रुकावट आती तेनालीराम राजगुरु का नाम ले लेता और उनसे कहता कि मैं उनका शिष्य हूं उसने मां से कहा जहां राजगुरु का नाम लिया सारी मुश्किल हल हो गई । व्यक्ति स्वयं कैसा भी हो लेकिन उसका नाम ऊंचा हो तो सारी बातें और शिकायतें अपने आप ही दूर होने लगती है। मुझे अपना नाम बदलना ही पड़ेगा। 

राजा कृष्णदेवराय के प्रति सन्मान जताने के लिए मुझे भी अपने नाम में उनके नाम का कृष्ण शब्द जोड़ लेना चाहिए। आज से मेरा नाम राम लिंग की जगह रामकृष्ण होगा । तेनालीराम की मां ने कहा बेटा मेरे लिए तो दोनों ही नाम एक समान है मैं तो अब भी तुझे करती हूं राम के नाम से और आगे भी इसी नाम से पुकारेंगे ।
 किसी गांव में तेनालीराम की मुलाकात राज्य प्रमुख से हुई । जो कि विजयनगर के प्रधानमंत्री का  संबंधी था । उसने तेनालीराम को बताया कि महाराज बहुत ही गुणवान विद्वान और उधार है । लेकिन उन्हें जब भी कभी कभी क्रोध आता है तो देखते ही देखते सर धड़ से अलग कर दिए जाते हैं। जब तक मनुष्य खतरा मोल ना ले वह सफल नहीं हो सकता। मैं अपना सिर बचा सकता हूं ।
 तेनालीराम ने  इसी स्वर में भूत आत्मा विश्वास दिखाया । राज्य प्रमुख ने  तेनालीराम को बताया कि प्रधानमंत्री   गुणवान व्यक्ति का बहुत आदर करते है। ऐसे लोगों के लिए उनके यहां पर  स्थान नहीं है जो अपनी सहायता खुद ही नहीं कर सकते ।
 चार महीने के लंबे यात्रा के बाद तेनालीराम अपने परिवार के साथ विजयनगर पहुंचा । वहां की चमक दमक देखकर वह तो दंग रह गया छोटी छोटी और बड़ी लंबी लंबी सड़कें और भीड़भाड़, हाथी घोड़े और सजी हुई शानदार दुकान यह सब तेनालीराम के लिए नई चीजें थी। उसने कुछ  दिन भरने के लिए के लिए  विजय नगर के एक परिवार से प्रार्थना की वहां अपनी मां पत्नी और बच्चे को छोड़कर वह राजगुरु के पास पहुंचा । माँ, पत्नी और बच्चे को छोड़कर और राजगुरु के यहां पहुंचा  तो वहां पर भीड़ का कोई ठिकाना नहीं था।  विजयनगर के राजमहल में बड़े से बड़े कर्मचारी से लेकर रसोईया तक वह जमा नौकर चाकर भी कुछ कम ना थे । 

तेनालीराम ने नौकर से कह कर संदेश देकर भेजा की राजगुरु से कहो तेनाली गांव से रामलिंगम आया है। नौकर ने वापस आकर कहा राजगुरु ने कहा है कि वह इस नाम के किसी भी व्यक्ति को नहीं जानते ।
 तेनालीराम बहुत हैरान हो गया वह नौकरों  को पीछे हटाते हुए सीधे राजगुरु के पास पहुंचा और तेनालीराम ने बड़े जोर से कहा राजू गुरु जी आपने मुझे पहचाना नहीं? मैं तेनाली  गांव से से राम लिंग हूं । जिसने आपकी काफी सेवा की थी । राजगुरु तेनालीराम को पहचानना नहीं चाहते थे ।
 राजगुरु ने नौकरों से चिल्ला कर कहा मैं नहीं जानता कि यह कौन आदमी है इसे उठाकर बाहर फेंक दो । नौकरों ने तेनालीराम को धक्के मार कर बाहर निकाल दिया । जालौर के खड़े हुए लोग यह दृश्य देखकर ठहाका मारकर हंसने लगे ।  तेनालीराम का कभी भी ऐसा नहीं हुआ था । उसने मन ही मन में ताकि राजगुरु से वह अपना  अपमान का बदला अवश्य ही लेगा। लेकिन इससे पहले राजा कृष्णदेव राय का दिल जीतना  बहुत जरूरी था ।
 दूसरे दिन  तेनालीराम राज दरबार में जा पहुंचा उसने देखा कि  वहां जोरो से वाद-विवाद हो रहा है । संसार क्या है और जीवन क्या है इसी बड़ी-बड़ी बातें हो रही थी ।  राज दरबार में बैठे हुए सारे विद्वान इस पर बहस कर रहे थे। एक पंडित ने अपने विचार प्रकट करते हुए कहा कि यह संसार एक धोखा है हम जो देखते हैं जो सुनते हैं जो महसूस करते हैं या जो सुनते हैं केवल हमारे विचार में है असल में ऐसा कुछ भी नहीं होता लेकिन हम सोचते हैं कि ऐसा हो रहा है। क्या सचमुच ऐसा है तेनालीराम ने कहा?  पंडित जी ने कहा कि यही बात हमारे शास्त्रों में भी लिखी हुई है। पंडित जी ने शास्त्रों का उदाहरण देकर का और सारे लोग चुप बैठ गए क्योंकि शास्त्रों में जो कहा होगा वही सत्य ही होगा । 

लेकिन तेनालीराम शास्त्रों से अधिक अपने बुद्धि पर विश्वास करता था। तेनालीराम ने वहां बैठे सभी लोगों से कहा यदि ऐसी बात है तो हम क्यों ना पंडित जी की बात की सच्चाई  जांच करें । विजयनगर के राजा राजा कृष्णदेव राय जी की ओर से दावत दी जा रही है उसे हम सब पेट भर कर खाएंगे और पंडित जी से प्रार्थना है कि वह बैठे रहे और सोचते रहे कि वह भी खा रहे हैं। तेनालीराम की बात पर राज दरबार में बहुत जोर से ठहाका लगा।
 पंडित जी की सूरत देखते ही बनती थी। राजा कृष्णदेवराय तेनालीराम पर इतने प्रसन्न हो गए कि तेनालीराम को स्वर्ण मुद्राओं का एक थैला  उपहार कर दिया । और उसी समय  तेनालीराम को  राजविदूषक  बना दिया ।
 दरबार में मौजूद सभी लोगों ने तालियां बजाकर राजा कृष्णदेव राय की घोषणा का स्वागत किया ।   तालियां बजाने वालों में राजगुरु भी था । इस तरह तेनालीराम ने अपने अपमान का बदला ले लिया।


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