तेनाली रमन हिंदी कहानिया | Tenali Raman story hindi | tenali raman hindi stories | रामलिंगम से तेनाली रमन तक का सफर



Tenali Raman story hindi or tenaliraman hindi stories - तेनाली रमन हिंदी कहानिया हम सब बचपन से सुनते आ रहे है। Tenali raman story - तेनाली रमन को तेनाली रामा के नाम से भी जाना जाता है। तेनाली रमन अपने चतुर बुद्धि के कारन प्रसित्द्ध थे।Tenali raman - तेनाली रमन हर काम को बड़ी चतुराई के साथ पूरा करते थे।  दोस्तों हिंदी Story Line आपके लिए लेकर आये है ऐसे ही मजेदार हिंदी कहानिया। 

१. रामलिंगम से तेनाली रमन तक का सफर    


tenali raman story hindi kids story
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 बहुत समय पहले की बात है तेनाली नाम के एक गांव में रामलिंगम नाम का एक निर्धन रहता था।  तेनाली विजयनगर का एक हिस्सा था।  जहां महान राजा कृष्णदेवराय का राज्य था।  
रामलिंगम एक चतुर व्यक्ति था। जिसे रमन भी बुलाते थे। पर उसे काम करना बिल्कुल भी पसंद नहीं था। और वह अपना समय आलस्य में बिताता था
तेनाली रमन जब एक दिन पेड़ के नीचे विश्राम कर रहा थावह एक साधु  पहुंचे वह तेनालीराम से बोले तुम्हें लज्जा नहीं आती जब सभी लोग काम में व्यस्त हैं तो तुम अपना समय आलस्य  में बिता रहे हो तेनाली रमन बोला साधु में काम तो करना चाहता हूं पर मैं नहीं कर पाता क्योंकि मेरा स्वास्थ्य ठीक नहीं है साधु जी बोले यह सचमुच दुर्भाग्यपूर्ण है
यदि ऐसी ही बात है तुम मैं तुम्हारी सहायता करूंगा मैं तुम्हें देवी को प्रसन्न करने का मंत्र  सिखाऊंगा जब वह प्रकट हो तो उनसे अच्छे स्वास्थ्य का वरदान मांग लेना और वह मंत्र हे "मां काली नमो नमः" रमन ने  जल्द ही वो पूरा मंत्र याद कर लिया फिर साधुजी बोले तुमने पूरा मंत्र शीघ्र ही याद कर लिया तो तुम आज रात को ही मंदिर जाना मूर्ति के सामने बैठकर 1008 बार मंत्र को दोहराना जब देवी प्रकट होगी तब तुम उनसे वर मांग लेना तेनाली रमन बोले आपका धन्यवाद महात्मा जैसा आपने कहा मैं बिल्कुल वैसा ही करूंगा  
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उसी रात में  रमन मंदिर में पहुंचा मूर्ति के सामने बैठकर मंत्र का जाप करने लगा   जैसे ही उसने आखिरी मंत्र का उच्चारण किया उसकी आंखों के सामने रोशनी गई
रमन  रमन ने एक स्वर सुना, मेरे पुत्र तुम्हारी पूजा से मैं प्रसन्न हूं तुम वरदान  मांगो जैसे  ही तेनाली रमन ने उन्हें देखा तो वह जोर जोर से हंसने लगा  देवी क्रोधित हो गई और बोली तुमने मुझ पर हंसने का साहस कैसे किया? तब तेनाली रमन बोला क्षमा करें देवी मां जब मुझे सर्दी होते हैं तब एक नाक होने पर भी मैं उसे रोक नहीं पाता लेकिन आपके तो  10 सिर है आपको सर्दी होने पर आप की क्या दशा होती होगी  
देवी को  तेनाली रमन अत्यंत मनोरंजक लगा। देवी ने तेनाली रमन से कहा तुम्हारा बर्ताव सचमुच हास्य पूर्वक है तुम एक चतुर एवं साहसी व्यक्ति हो। तुम सदा लोगों का मनोरंजन करने में सफल होंगे आज से तुम में विकटकवि के नाम से पुकारा जाएगा  
तेनाली रमन ने कहा धन्यवाद माता क्योंकि विकटकवि दोनों ओर से एक जैसा ही लिखा जाता है। तो उल्टा सीधा एक समान किंतु इस वरदान से अन्य लोग प्रसन्न हो गए मुझे से क्या लाभ होगा देवी? देवी ने कहा तुम एक साहसी लेकिन  मुंहफट व्यक्ति हो लेकिन मुझे अच्छा लगा मैं तुम्हें अपने 2 में से किसी एक  वरदान को देती  हूं  
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रमन ने मां काली के हाथ में दो कटोरे देखें सोने के कटोरे में ज्ञान तथा विवेक का मीठा दूध है। और चांदी के कटोरे में धन तथा  वैभव की खट्टी दही है फिर देवी ने कहा इनमें से किसी एक को चुन लो फिर तेनाली रमन ने कहा देवी माता में दोनों को चखे बिना निर्णय कैसे ले सकता हूं बिना सोचे देवी ने दोनों  कटोरे तेनाली रमन को दे दिए यह समझने से पहले कि क्या हो रहा है तेनाली रमन ने दोनों कटोरे का घोल पीलिया
देवी फिर क्रोधित हो गई। परंतु रमन ने विनम्रता से अपना सिर झुका लिया और बोला वह माता मुझे क्षमा करें  लेकिन एक के बिना दूसरा व्यर्थ है आनंदमय जीवन के लिए तो मेरे पास दोनों होने चाहिए देवी शांत हो गई और बोली क्योंकि आप तुम्हारे पास दोनों वर है तो तुम अत्यंत चतुर और वैभवशाली बनोगे यह शब्द कहे कर  देवी वहां से से गायब हो गए रमन बहुत प्रसन्न हुआ तथा घर लौट आया
तेनाली रमन सोचने लगा यह तेनाली गांव मेरे जैसे व्यक्ति के लिए नहीं है मुझे विजयनगर जाकर राजा कृष्णदेव राय का हृदय जीतने का प्रयास करना चाहिए रमन जानता था कि यह सरल कार्य नहीं है। लेकिन वह विजयनगर जाने के लिए कटिबद्ध था बैठे-बैठे वह सोचने लगा  मैं पहले विजयनगर जाऊंगा किंतु उससे पहले मुझे किसी की सहायता लेनी होगी
   सहायता ढूंढते ढूंढते रमन के बहुत दिन व्यतीत हो गए एक दिन हम उनको पता चला कि विजय नगर के राजगुरु उसके गांव के मंदिर में आने वाले है अगले दिन जब राजगुरु मंदिर में आए तो रमन ने उनका पीछा किया रमन बोला गुरुजी मैं तेनाली रमन हूं मुझे अपना सेवक  माने   राजपुरोहित सोचने लगा क्यों ना मैं इस मुर्ख को अपना सेवक मान लो और उससे अपना सारा काम करवा लु  
     राजपुरोहित ने तेनाली रमन से कहा मैं नदी में स्नान करने जा रहा हूं तब तक तुम मेरे वस्त्र संभालो तेनाली रमन बोला गुरुजी मुझे आशा है कि मैं भी 1 दिन विजय नगर की सभा में जाऊंगा राजपुरोहित ने पूछा अच्छा  वह कैसे? तेनाली बोला विदूषक बनके   राजपुरोहित बोले तुम विजयनगर जाना और मैं तुम्हारी सहायता करूंगा
सहायक मिलजाने की विश्वास के साथ कुछ दिन बाद तेनाली रमन अपनी मां पत्नी और सामान के साथ तेनाली से विजयनगर चल पड़ा जब वो विजयनगर पहुंचा तो उसने राजपुरोहित से मिलने का निश्चय किया और अगले ही दिन और आज पूरे के घर चला गया। 
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राजपुरोहित ने जैसे ही तेनाली रमन को देखा तत्काल ही उसने अपने सेवक को  बुला लिया और कहा वहां उद्यान में एक आदमी है उसे बाहर  फेंक दो सेवक ने तेनाली रमन और उसके परिवार को वहां से निकाल दिया अगले कुछ दिनों तक तेनाली रमन विजयनगर में घूमता रहा
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एक दिन उसने राजगुरु को नदी की ओर जाते हुए देखा रमन ने राजगुरु के सारे वस्त्र उठाया और चट्टान के पीछे छुप गया राजगुरु जॉब अपने वस्त्र लेने के लिए पलटी तो चकित रह गए तेनाली रमन बोला आप के वस्त्र मेरे पास है और मैं आपको तभी दूंगा आप मुझे अपने कंधों पर बिठाकर राज सभा में ले जाएंगे। 
अपने वस्त्र पाने के लिए राजगुरु को वचन देना पड़ा जैसा तय हुआ था  राजगुरु ने तेनाली रमन को अपने कंधे पर बिठाया तथा चल पड़े
जब वह महल के प्रांगण में पहुंचे राजा कृष्णदेव राय ने यह देखा रमन ने राजा को देखा और आगे क्या होगा इसका उसे अनुमान हो गया और वह राजगुरु के  कंधों से उतर गया और राजपुरोहित से बोला कि मैंने आप का बहुत अपमान किया और अब मैं आपको उठा कर ले जाऊंगा राजगुरु के रोकने से पहले ही रमन ने उनको अपने कंधे पर उठा लिया तथा चल पड़ा  
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राजे ने अपने सिपाहियों से कहा जो आदमी कंधे पर बैठा हुआ है उसकी पिटाई करो और हमारे पास लेकर आओ रक्षक जो एकदम नया था जो अपनी स्वामी भक्ति दर्शना चाहता था उसने कंधे पर बैठे राजगुरु को नीचे घसीटा और उनकी बहुत पिटाई की तथा रमन को सम्मान के साथ राजदरबार में  लेकर चला गया  
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राजा कृषदेवराय तेनाली रमन को देखकर अचंभित हो गए और उन्होंने तेनाली रमन से पूछा कि तुम कौन हो और राजपुरोहित कहा है? रमन बोला कि राज्यसभा में आने के लिए मैंने ही उपाय किया रमन ने पूरी कथा कह सुनाई कृष्णदेव राय राजा को निडर साहसी तथा बड़बोले रमन का व्यवहार अत्यंत पसंद आया और राजा कृष्णदेवराय ने तेनाली रमन को विजयनगर सभा का विदूषक घोषित किया


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